कांग्रेस देश की सबसे पुरानी राजनीतिक पार्टी है। भारतीय राजनीति में कांग्रेस लंबे समय तक केंद्रीय भूमिका में रही, लेकिन समय-समय पर पार्टी के भीतर असहमति और नेतृत्व से टकराव ने कई बड़े नेताओं को अलग राह चुनने के लिए मजबूर किया। इसी कड़ी में सबसे बड़ा उदाहरण ममता बनर्जी है, जिन्होंने कांग्रेस से अलग होकर अपनी पार्टी बनाई और पश्चिम बंगाल की राजनीति को पूरी तरह बदल दिया।
कांग्रेस से अलग होकर ममता बनर्जी ने 1998 में तृणमूल कांग्रेस (TMC) की नींव रखी। आज यह पार्टी बंगाल में सत्ता की धुरी बन चुकी है। ममता की कहानी सिर्फ एक नेता की विद्रोह की नहीं, बल्कि क्षेत्रीय राजनीति के उदय की भी मिसाल है।
केंद्र में कांग्रेस से भी मंत्री भी रहीं
ममता बनर्जी का कांग्रेस से रिश्ता 1970 के दशक से था। उन्होंने 26 साल तक कांग्रेस की सदस्यता निभाई, लोकसभा सांसद बनीं और केंद्र में मंत्री भी रहीं। लेकिन 1990 के दशक के अंत में बंगाल कांग्रेस की आंतरिक कलह और वामपंथी शासन (CPM) के खिलाफ रणनीति पर केंद्र की कांग्रेस लीडरशिप से मतभेद उभरे। ममता आरोप लगाती रहीं कि बंगाल कांग्रेस सीपीएम की 'गुलाम' बन गई है और राज्य में वामपंथियों को चुनौती देने की बजाय समझौता कर रही है।
जब कांग्रेस की बैठक का नहीं मिला निमंत्रण
9 अगस्त 1997 को कोलकाता में ऑल इंडिया कांग्रेस कमेटी (AICC) का पूर्ण सत्र चल रहा था। ममता बनर्जी को निमंत्रण नहीं मिला। उन्होंने नेताजी इंडोर स्टेडियम के बाहर विशाल जनसभा की और तृणमूल कांग्रेस (Trinamool Congress) के गठन की घोषणा कर दी।
1 जनवरी 1998 को TMC को मिली मान्यता
22 दिसंबर 1997 को कांग्रेस ने उन्हें पार्टी से निष्कासित कर दिया गया। ममता बनर्जी ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में ऐलान किया कि वे तृणमूल कांग्रेस के बैनर पर चुनाव लड़ेंगी। 1 जनवरी 1998 को चुनाव आयोग ने इसे आधिकारिक राजनीतिक दल के रूप में मान्यता दे दी।

2011 में बनी राज्य की मुख्यमंत्री
पार्टी का चुनाव चिह्न ‘घास-फूल’ मिला। ममता बनर्जी ने इसे बंगाल की जमीनी राजनीति से जोड़ दिया। 1998 के लोकसभा चुनाव में TMC ने 7-8 सीटें जीतीं। 2009 में यह यूपीए का हिस्सा बनी, लेकिन 2011 में ममता बनर्जी ने वाम मोर्चे को करारी हार दी। 34 साल बाद बंगाल में सत्ता बदल गई। TMC ने 184 सीटें जीतीं और ममता मुख्यमंत्री बनीं। आज TMC बंगाल में सबसे बड़ी पार्टी है और ममता ने कांग्रेस को राज्य में लगभग समाप्त कर दिया है।
इन नेताओं ने कांग्रेस से अलग होकर बनाई अपनी पार्टी
ऐसे ही अन्य बड़े नेता जिन्होंने कांग्रेस छोड़कर अपनी अलग पार्टी बनाई है। इसमें महाराष्ट्र से शरद पवार, आंध्र प्रदेश से वाई.एस. जगन मोहन रेड्डी, छत्तीसगढ़ से अजित जोगी और पंजाब से कैप्टन कैप्टन अमरिंदर सिंह का नाम शामिल है।

शरद पवार - राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी
महाराष्ट्र के दिग्गज नेता शरद पवार ने 1999 में सोनिया गांधी के ‘विदेशी मूल’ को लेकर आपत्ति जताई। शरद पवार ने पी.ए. संगमा और तारिक अनवर के साथ कांग्रेस छोड़कर 10 जून 1999 को राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (NCP) बनाई। पार्टी ने महाराष्ट्र में मजबूत पकड़ बनाई और कई बार केंद्र में भी सहयोगी रही। अब ये पार्टी NCP (SP) के नाम से जानी जाती है। महाराष्ट्र की राजनीति में आज भी पवार परिवार की धुरी है।

वाई.एस. जगन मोहन रेड्डी - वाईएसआर कांग्रेस पार्टी
आंध्र प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री वाई.एस. राजशेखर रेड्डी (YSR) के बेटे जगन मोहन रेड्डी ने पिता की मौत के बाद कांग्रेस हाईकमान से टकराव हो गया। साल 2009 में वाई.एस. राजशेखर रेड्डी (YSR) की हेलीकॉप्टर दुर्घटना में मौत हुई, लेकिन कांग्रेस ने जगन को मुख्यमंत्री नहीं बनाया। नवंबर 2010 में जगन ने कांग्रेस से इस्तीफा दिया और मार्च 2011 में YSRCP की घोषणा की। पार्टी ने 2014 में आंध्र में बड़ी जीत हासिल की और जगन मोहन रेड्डी राज्य के मुख्यमंत्री बने।

अजित जोगी - छत्तीसगढ़ जनता कांग्रेस
छत्तीसगढ़ के पूर्व मुख्यमंत्री अजित जोगी ने भी कांग्रेस छोड़कर अपनी पार्टी जनता कांग्रेस छत्तीसगढ़ (जे) बनाई, लेकिन यह ज्यादा सफल नहीं हो सकी। इसे आमतौर पर JCC (J) या जोगी कांग्रेस के नाम से भी जाना जाता है। अजित जोगी के निधन के बाद ये पार्टी उभर नहीं सकी। वहीं, हाल ही में दिसंबर 2024 में अजित की पत्नी रेणु जोगी ने पार्टी को कांग्रेस में विलय करने का प्रस्ताव दिया था।

कैप्टन अमरिंदर सिंह - पंजाब लोक कांग्रेस
पंजाब के पूर्व मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह को 2021 में कांग्रेस हाईकमान ने मुख्यमंत्री पद से हटा दिया। उन्होंने कांग्रेस छोड़कर 2 नवंबर 2021 को पंजाब लोक कांग्रेस बनाई। हालांकि, 2022 चुनाव में पार्टी को कोई सीट नहीं मिली और बाद में यह BJP में विलय हो गई।